सपने हरसिंगार
नींद -बगिया खिलें
रुपहले सुनहले
चुपचाप आ मिलें
सजे नवल सिंगार
सपने हरसिंगार
रात शिउली सजे
सपने नैन बसें
भोर आहट झरें
जुड़ें न फिर डार
सपने हरसिंगार
रंग भरी दुनियाँ
पल दो पल खुशियाँ
देते बार बार
सुवासित मन- द्वार
सपने हरसिंगार
Wednesday, 28 March 2012
Thursday, 15 March 2012
उत्तराखंड के लोक पर्व
फूल देई (देली पूजा)
हमारे देश में ऋतु-परिवर्तन के आधार पर कई त्योहार माने जाते हैं. ठिठुराती सर्दी की विदाई के साथ जब वसंत ऋतु आती है तो स्वयं प्रकृति ही नईरूप सज्जा से सुशोभित होकर मन में ऐसी उमंग जगाती है कि लोगों का मन नाचने-गाने को करता है .शिव रात्रि.बसंत पंचमी फिर होली .होली तो मस्ती ख़ुशी और रंगों से भरपूर होती है .उसके बाद चैत्रमास आरम्भ होते ही कई उत्सव मनाए जाते हैं .
उत्तराखंड में सौर और चन्द्र पंचांग के आधार पर कई विशेष त्योहार मनाए जाते हैं जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलते .
चैत्र मास की पहले तिथि(चैत्रीय संक्रांति )को `फूल देई `मानी जाती है .इस दिन हर घर की छोटी-छोटी कन्याएँ सज धज कर पूजा की थाली में चावल ,प्युली,बुरांश ,गेंदे के फूल ,पत्तियाँ ,.नारियल, गुड आदि सामग्री सजाकर आपने घर की देहरी की पूजा करती हैं फिर आस-पास के सारे घरों में जाकर देहरी(देली)की पूजा करती हैं .चावल और फूल सजाती हुई अपनी सुमधुर आवाज़ में ये आशीर्वचन गाती हैं.......
फूल देई छम्मा देई
देनी द्वार भर भकार
तेरी देई नमस्कार ..
जिसमें घर की देहरी से विनम्र प्रार्थना की जाती है कि इस घर के भंडार सदा भरे रहे .देहरी सबके लिए शुभकारी हो उसको सदा नमन.हर घर कि महिलाएँ अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनको गुड,चावल और रूपये -पैसे भेंट देती हैं. कन्याएँ सभी घरों में जाती हैं कोई घर छोड़ा नहीं जाता.यह समाज के हर घर की खुश हाली की कामना से जुड़ा हुआ है.बाद में हर घर से एकत्रित चावलों से एक विशिष्ट व्यंजन बनाया जाता है जिसे सै या सैह कहा जाता है. पहले चावलों को धो कर .,भिगो कर फिर छाँव में सुखाकर पीसा जाता है फिर दही में थोड़ी देर भिगो कर घी में भून कर गुड मिला कर पकाया जाता है .जो हलवे की भांति स्वादिष्ट होता है इसे भी आस-पड़ोस में बाँट कर ही खाया जाता है
इस त्योहार की विशेषता है कि एक तो ये वसंत के आगमन की खुशियों का द्योतक है .दूसरा ..यह एक बाल-पर्व है.जिसमें कन्याएँ भाग लेती हैं .तीसरा ..समाज और आस-पास के लोगो के लिए कल्याण की कामनाओं से युक्त है .और सब से महत्वपूर्ण है .....उस घर के मुख्य द्वार का पूजन जो घर हमें हर तरह का सुख ,आश्रय और सुरक्षा देता है .घर से प्रिय और कौन सा स्थान है ?और वहाँ आने- जाने के लिए हम हमेशा ही देहरी लाँघते रहते हैं .
गाँवों और छोटे कस्बों की यह परम्परा बड़े शहरों के लोगो के लिए कितनी विस्मय कारी है ?जहाँ हमारे पडोसी भी अजनबी से लगते हैं और दरवाजों पर कितने ताले -चिटकनी लगी होती हैं.कोई अपना भी आये तो सूक्ष्म -छिद्र से तसल्ली करने के बाद ही दरवाज़ा खुलता है .ऐसे में ये त्योहार यादों में रच- बस जाते हैं .
भिटौली (भेटुण )
चैत्र मास आरंभ होते ही उत्तराखंड के लोग एक पर्व मनाते हैं .इए भिटौली ,भिटोई या भेंटण कहते हैं .चैत्र नए वर्ष का प्रथम माह है इसलिए लड़कियों विशेष तौर पर विवाहित लड़कियों के लिए बहुत महत्त्व रखता है.लड़की का भाई उपहार लेकर उसके ससुराल उसे मिलने जाता है .उनको इस महीने मायके बुलाया जाता है.यह एक पारिवारिक पर्व है अर्थात अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी दिन मनाया जा सकता है..इस दिन बनाए जाने वाले मुख्य व्यंजन पूरी ,पुए ,और सिंगल होते हैं. सै या सैह(चावल के आटे को दही में भिगो कर ,घी में गुड़ के साथ पका कर हलवे की तरह का अति स्वादिष्ट व्यंजन) इस दिन का विशिष्ट पकवान होता है.लड़की के ससुराल को भी भाई अन्य कपड़े द्रव्य आदि के साथ यही ले जाता है .विवाहित कन्याओं को इस भेंट का बेसब्री से इंतज़ार रहता है .ससुराल में ये वस्तुएँ आसपड़ोस में बाँटी जाती हैं. मायके आने पर भी लड़कियों को यही व्यंजन खिलाए जाते अविवाहित कन्याओं को भी भेंट में कपड़े और धन आदि दिया जाता है.पास पड़ोस के सभी घरों और रिश्तदारो की कन्याओं को भी यथा सामर्थ्य भेंट और पकवान भेजे जाते हैं या उन्हें आमंत्रित किया जाता है.
विवाह के समय भी कन्या की विदाई के अवसर पर भिटौली दी जाती है.पहली भिटौली होली के अवसर पर दी जाती है बाद में चैत्र माह में ही दिए जाने की प्रथा है.इस पर्व का इतना महत्त्व है की उत्तराखण्ड के लोक -गीत,संगीत और लोक कथाओं में बहुधा वर्णन किया गया है लड़कियों को इस महीने की प्रतीक्षा रहती है उन्हें मायके जाने का अवसर मिलता है.आजकल मनी आर्डर द्वारा धन राशि भेज कर इस प्रथा का निर्वाह किया जाता है.
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