कुछ `तांका`
एक सूराख
कमज़ोर दीवार
संदेह छोटा
छीजते स्नेह रिश्ते
ढहते घर -द्वार .
लम्बी सड़कें
गाँव शहर मिलें
निष्ठुर लगे
कष्ट झेले तन पै
लक्ष्य मिले राही को .
गेंद का खेल
सब मनभावन
उसकी पीड़ा
जानें वृद्धजन ही
संतति बाँटें पारी .
कोमल जिह्वा
करे रसास्वादन
मधुर बोल
प्यार रस घोलती
देती अपनापन .
Thursday, 12 April 2012
Wednesday, 28 March 2012
sapne harsingaar
सपने हरसिंगार
नींद -बगिया खिलें
रुपहले सुनहले
चुपचाप आ मिलें
सजे नवल सिंगार
सपने हरसिंगार
रात शिउली सजे
सपने नैन बसें
भोर आहट झरें
जुड़ें न फिर डार
सपने हरसिंगार
रंग भरी दुनियाँ
पल दो पल खुशियाँ
देते बार बार
सुवासित मन- द्वार
सपने हरसिंगार
नींद -बगिया खिलें
रुपहले सुनहले
चुपचाप आ मिलें
सजे नवल सिंगार
सपने हरसिंगार
रात शिउली सजे
सपने नैन बसें
भोर आहट झरें
जुड़ें न फिर डार
सपने हरसिंगार
रंग भरी दुनियाँ
पल दो पल खुशियाँ
देते बार बार
सुवासित मन- द्वार
सपने हरसिंगार
Thursday, 15 March 2012
उत्तराखंड के लोक पर्व
फूल देई (देली पूजा)
हमारे देश में ऋतु-परिवर्तन के आधार पर कई त्योहार माने जाते हैं. ठिठुराती सर्दी की विदाई के साथ जब वसंत ऋतु आती है तो स्वयं प्रकृति ही नईरूप सज्जा से सुशोभित होकर मन में ऐसी उमंग जगाती है कि लोगों का मन नाचने-गाने को करता है .शिव रात्रि.बसंत पंचमी फिर होली .होली तो मस्ती ख़ुशी और रंगों से भरपूर होती है .उसके बाद चैत्रमास आरम्भ होते ही कई उत्सव मनाए जाते हैं .
उत्तराखंड में सौर और चन्द्र पंचांग के आधार पर कई विशेष त्योहार मनाए जाते हैं जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलते .
चैत्र मास की पहले तिथि(चैत्रीय संक्रांति )को `फूल देई `मानी जाती है .इस दिन हर घर की छोटी-छोटी कन्याएँ सज धज कर पूजा की थाली में चावल ,प्युली,बुरांश ,गेंदे के फूल ,पत्तियाँ ,.नारियल, गुड आदि सामग्री सजाकर आपने घर की देहरी की पूजा करती हैं फिर आस-पास के सारे घरों में जाकर देहरी(देली)की पूजा करती हैं .चावल और फूल सजाती हुई अपनी सुमधुर आवाज़ में ये आशीर्वचन गाती हैं.......
फूल देई छम्मा देई
देनी द्वार भर भकार
तेरी देई नमस्कार ..
जिसमें घर की देहरी से विनम्र प्रार्थना की जाती है कि इस घर के भंडार सदा भरे रहे .देहरी सबके लिए शुभकारी हो उसको सदा नमन.हर घर कि महिलाएँ अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनको गुड,चावल और रूपये -पैसे भेंट देती हैं. कन्याएँ सभी घरों में जाती हैं कोई घर छोड़ा नहीं जाता.यह समाज के हर घर की खुश हाली की कामना से जुड़ा हुआ है.बाद में हर घर से एकत्रित चावलों से एक विशिष्ट व्यंजन बनाया जाता है जिसे सै या सैह कहा जाता है. पहले चावलों को धो कर .,भिगो कर फिर छाँव में सुखाकर पीसा जाता है फिर दही में थोड़ी देर भिगो कर घी में भून कर गुड मिला कर पकाया जाता है .जो हलवे की भांति स्वादिष्ट होता है इसे भी आस-पड़ोस में बाँट कर ही खाया जाता है
इस त्योहार की विशेषता है कि एक तो ये वसंत के आगमन की खुशियों का द्योतक है .दूसरा ..यह एक बाल-पर्व है.जिसमें कन्याएँ भाग लेती हैं .तीसरा ..समाज और आस-पास के लोगो के लिए कल्याण की कामनाओं से युक्त है .और सब से महत्वपूर्ण है .....उस घर के मुख्य द्वार का पूजन जो घर हमें हर तरह का सुख ,आश्रय और सुरक्षा देता है .घर से प्रिय और कौन सा स्थान है ?और वहाँ आने- जाने के लिए हम हमेशा ही देहरी लाँघते रहते हैं .
गाँवों और छोटे कस्बों की यह परम्परा बड़े शहरों के लोगो के लिए कितनी विस्मय कारी है ?जहाँ हमारे पडोसी भी अजनबी से लगते हैं और दरवाजों पर कितने ताले -चिटकनी लगी होती हैं.कोई अपना भी आये तो सूक्ष्म -छिद्र से तसल्ली करने के बाद ही दरवाज़ा खुलता है .ऐसे में ये त्योहार यादों में रच- बस जाते हैं .
भिटौली (भेटुण )
चैत्र मास आरंभ होते ही उत्तराखंड के लोग एक पर्व मनाते हैं .इए भिटौली ,भिटोई या भेंटण कहते हैं .चैत्र नए वर्ष का प्रथम माह है इसलिए लड़कियों विशेष तौर पर विवाहित लड़कियों के लिए बहुत महत्त्व रखता है.लड़की का भाई उपहार लेकर उसके ससुराल उसे मिलने जाता है .उनको इस महीने मायके बुलाया जाता है.यह एक पारिवारिक पर्व है अर्थात अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी दिन मनाया जा सकता है..इस दिन बनाए जाने वाले मुख्य व्यंजन पूरी ,पुए ,और सिंगल होते हैं. सै या सैह(चावल के आटे को दही में भिगो कर ,घी में गुड़ के साथ पका कर हलवे की तरह का अति स्वादिष्ट व्यंजन) इस दिन का विशिष्ट पकवान होता है.लड़की के ससुराल को भी भाई अन्य कपड़े द्रव्य आदि के साथ यही ले जाता है .विवाहित कन्याओं को इस भेंट का बेसब्री से इंतज़ार रहता है .ससुराल में ये वस्तुएँ आसपड़ोस में बाँटी जाती हैं. मायके आने पर भी लड़कियों को यही व्यंजन खिलाए जाते अविवाहित कन्याओं को भी भेंट में कपड़े और धन आदि दिया जाता है.पास पड़ोस के सभी घरों और रिश्तदारो की कन्याओं को भी यथा सामर्थ्य भेंट और पकवान भेजे जाते हैं या उन्हें आमंत्रित किया जाता है.
विवाह के समय भी कन्या की विदाई के अवसर पर भिटौली दी जाती है.पहली भिटौली होली के अवसर पर दी जाती है बाद में चैत्र माह में ही दिए जाने की प्रथा है.इस पर्व का इतना महत्त्व है की उत्तराखण्ड के लोक -गीत,संगीत और लोक कथाओं में बहुधा वर्णन किया गया है लड़कियों को इस महीने की प्रतीक्षा रहती है उन्हें मायके जाने का अवसर मिलता है.आजकल मनी आर्डर द्वारा धन राशि भेज कर इस प्रथा का निर्वाह किया जाता है.
Monday, 20 February 2012
sookhi nadi
सूखी नदी
(नदी माँ )
ये जो दिख रही है
नदी सूखती हुई
जर्जरित होती
उबड़ खाबड़
झुर्राई ,पथराई सी
लुप्त धारा...
आभास दिलाती
अपने चौड़े पाटों से
बहती थी बड़ी नदी यहाँ ..
हाँ मै थी जीवन भरी .
मेरा बचपन
बीता ,चंचल निर्झरिणी बन
यौवन अल्हड
प्रौढ़ा धीरा गंभीर .
संततियों को
सींचा कोख से
गोद में ले
उर लगाकर
मधुर कल ध्वनि
लोरी सुना ,कर
सर्वस्व निछावर
किया पालन .
हुए बड़े वे
चले राहअपनी
ले अलग थलग .
ऊर्जा गई मेरी
स्रोत कमज़ोर
थकी हारी सी
बहती सहती .
मुड़ के देखते
स्नेह भर अपनत्व से
फिर छलकती मै
भावना उर्मिल
भिगोती सींचती
सिक्ता कणों को
शुष्क होती नहीं
पर तुमने..
प्यास अपनी बुझाई
दुःख दर्द धोए
कलुष सौंपे मुझे
खुद बने निर्मल
सभ्य सुघड़
बना मुझे मंद मलिन .
कह मुझे शक्ति हीना .
व्यर्थ वृद्धा विरल .
कंकड़ रोड़े भरी
पथरीली चुभती ,
राह रोकती
अडचनों सी
लगती तुम्हें
क्योकि ...
मेरा सारा स्नेह प्यार
खपा सींचते पोषते
अब ..
अश्रु जल सूखे सभी
आँखों में बस किरकिरी
कोई आये भूले से
सुध बुध लेने कभी .
रीती हुई क्यो ये नदी ?
क्यों रह गई सूखी नदी?
(नदी माँ )
ये जो दिख रही है
नदी सूखती हुई
जर्जरित होती
उबड़ खाबड़
झुर्राई ,पथराई सी
लुप्त धारा...
आभास दिलाती
अपने चौड़े पाटों से
बहती थी बड़ी नदी यहाँ ..
हाँ मै थी जीवन भरी .
मेरा बचपन
बीता ,चंचल निर्झरिणी बन
यौवन अल्हड
प्रौढ़ा धीरा गंभीर .
संततियों को
सींचा कोख से
गोद में ले
उर लगाकर
मधुर कल ध्वनि
लोरी सुना ,कर
सर्वस्व निछावर
किया पालन .
हुए बड़े वे
चले राहअपनी
ले अलग थलग .
ऊर्जा गई मेरी
स्रोत कमज़ोर
थकी हारी सी
बहती सहती .
मुड़ के देखते
स्नेह भर अपनत्व से
फिर छलकती मै
भावना उर्मिल
भिगोती सींचती
सिक्ता कणों को
शुष्क होती नहीं
पर तुमने..
प्यास अपनी बुझाई
दुःख दर्द धोए
कलुष सौंपे मुझे
खुद बने निर्मल
सभ्य सुघड़
बना मुझे मंद मलिन .
कह मुझे शक्ति हीना .
व्यर्थ वृद्धा विरल .
कंकड़ रोड़े भरी
पथरीली चुभती ,
राह रोकती
अडचनों सी
लगती तुम्हें
क्योकि ...
मेरा सारा स्नेह प्यार
खपा सींचते पोषते
अब ..
अश्रु जल सूखे सभी
आँखों में बस किरकिरी
कोई आये भूले से
सुध बुध लेने कभी .
रीती हुई क्यो ये नदी ?
क्यों रह गई सूखी नदी?
Tuesday, 8 November 2011
Saturday, 5 November 2011
Thursday, 3 November 2011
पहली किरण
लघु कथा (लोक कथा पर आधारित) एक गाँव में पुरानी प्रथा चली आ रही थी .जो भी व्यक्ति बूढा हो जाता उसे उस के घर के लोग जंगल में अकेले छोड़ आते .वह फिर जैसे तैसे जीवन जीता .घर के अ न्यलोग बिना रोक- टोक के रहते .वे मानते थे कि वृद्धावस्था में लोग व्यर्थ हो जाते हैं .परिवार को उनका बोझ उठाना पड़ता है .बूढ़े लोग हालांकि बाल बच्चों की मोह माया में ग्रस्त होते थे परन्तु इस प्रथा को नकार नहीं सकते थे । एक बार एक लड़के को अपने पिता को छोड़नाथा .पर वह अपने पिता को बहुत प्यार करता था बचपन से लेकर अब तक हर काम में पिता उसके साथ रहते थे .उसे यह बात असह्य लगी .वह सोचता रहता कि कैसे पिता को न जाने दूं .पर प्रथा को तोड़ भी नहीं सकता था .बहुत सोच विचार के बाद उसे एक युक्ति सूझी .उसने घर में एक तहखाना बनवा दिया .छुप कर रहने के सारे बंदोबस्त कर दिए ताकि किसी को भी पता न लगे .सब को उसने कह दिया कि वह अपने पिता को जंगल में छोड़ आया है । इस बात को कई वर्ष बीत गए किसी को पता न लग पाया .बेटा खुश था कि उसे अपने पिता के साथ रहने का और सेवा करने का मौका मिल रहा है । एक बार वहाँ के राजा ने एक ऐसी प्रतियोगिता रखी कि जो व्यक्ति अगली सुबह सब से पहले सूर्य की रौशनी को देखेगा उसे वह बहुत सारा धन देगा और राज दरबार में उसे ऊंचा स्थान भी देगा .सभी लोग आतुर होकर भाग लेने की तैयारी करने लगे .पर सूर्य की पहली किरण को कैसे देखें ?उस बेटे ने ये बात अपने पिता को बताई .पिता ने बेटे को समझाया कि ---`देखो बेटा! सभी लोग रात से सुबह की प्रतीक्षा में बैठ जायेंगे .जब सूरज उगेगा तभी उसकी पहली किरण दिखेगी .अगर तुम इस में भाग ले रहे हो तो वैसा करना जैसा मै तुम्हे बताऊ । सब लोग सूर्योदय की प्रतीक्षा में पूर्व की ओर मुंह करके बैठे होंगे पर तू पश्चिम की ओर मुंह कर के बैठ जाना क्योकि जैसे ही सूर्योदय होने को होगा तो उसकी पहली किरण पश्चिम की तरफ वाली पहाड़ी की चोटी पर पड़ेगी .बाकी लोग तो जब सूर्य उगेगा तभी देखेंगे परन्तु पहली किरण तू ही देखेगा क्योकि सूर्य की पहली किरण सामने की पहाड़ी को प्रकाशित करेगी .इस तरह सूर्य की पहली किरण देखने की प्रतियोगिता तू ही जीतेगा .बेटे ने वैसा ही किया .उसे ईनाम और राज दरबार में मंत्री का पद मिला .सभी गाँव वाले उसकी बुद्धिमत्ता से चकित रह गए.राजा ने भी पूछा .उसने अभय दान मांगते हुए सच्चाई बतादी .राजा खुश हुआ .उस दिन से उसने इस प्रथा का अंत कर दिया .उसने प्रजा से कहा --`` अब से किसी भी वृद्ध को अकेले नहीं छोड़ा जाएगा .वे शारीरिक रूप से कमज़ोर हो सकते हैं परन्तु जीवन के अनुभवों से हर समस्या का समाधान कर सकते हैं और भावी पीढ़ी के लिए बोझ नहीं वरदान सिद्ध हो सकते हैं ।`` अतः उनको हमेशा सम्मान मिलना चाहिए ...
लघु कथा (लोक कथा पर आधारित) एक गाँव में पुरानी प्रथा चली आ रही थी .जो भी व्यक्ति बूढा हो जाता उसे उस के घर के लोग जंगल में अकेले छोड़ आते .वह फिर जैसे तैसे जीवन जीता .घर के अ न्यलोग बिना रोक- टोक के रहते .वे मानते थे कि वृद्धावस्था में लोग व्यर्थ हो जाते हैं .परिवार को उनका बोझ उठाना पड़ता है .बूढ़े लोग हालांकि बाल बच्चों की मोह माया में ग्रस्त होते थे परन्तु इस प्रथा को नकार नहीं सकते थे । एक बार एक लड़के को अपने पिता को छोड़नाथा .पर वह अपने पिता को बहुत प्यार करता था बचपन से लेकर अब तक हर काम में पिता उसके साथ रहते थे .उसे यह बात असह्य लगी .वह सोचता रहता कि कैसे पिता को न जाने दूं .पर प्रथा को तोड़ भी नहीं सकता था .बहुत सोच विचार के बाद उसे एक युक्ति सूझी .उसने घर में एक तहखाना बनवा दिया .छुप कर रहने के सारे बंदोबस्त कर दिए ताकि किसी को भी पता न लगे .सब को उसने कह दिया कि वह अपने पिता को जंगल में छोड़ आया है । इस बात को कई वर्ष बीत गए किसी को पता न लग पाया .बेटा खुश था कि उसे अपने पिता के साथ रहने का और सेवा करने का मौका मिल रहा है । एक बार वहाँ के राजा ने एक ऐसी प्रतियोगिता रखी कि जो व्यक्ति अगली सुबह सब से पहले सूर्य की रौशनी को देखेगा उसे वह बहुत सारा धन देगा और राज दरबार में उसे ऊंचा स्थान भी देगा .सभी लोग आतुर होकर भाग लेने की तैयारी करने लगे .पर सूर्य की पहली किरण को कैसे देखें ?उस बेटे ने ये बात अपने पिता को बताई .पिता ने बेटे को समझाया कि ---`देखो बेटा! सभी लोग रात से सुबह की प्रतीक्षा में बैठ जायेंगे .जब सूरज उगेगा तभी उसकी पहली किरण दिखेगी .अगर तुम इस में भाग ले रहे हो तो वैसा करना जैसा मै तुम्हे बताऊ । सब लोग सूर्योदय की प्रतीक्षा में पूर्व की ओर मुंह करके बैठे होंगे पर तू पश्चिम की ओर मुंह कर के बैठ जाना क्योकि जैसे ही सूर्योदय होने को होगा तो उसकी पहली किरण पश्चिम की तरफ वाली पहाड़ी की चोटी पर पड़ेगी .बाकी लोग तो जब सूर्य उगेगा तभी देखेंगे परन्तु पहली किरण तू ही देखेगा क्योकि सूर्य की पहली किरण सामने की पहाड़ी को प्रकाशित करेगी .इस तरह सूर्य की पहली किरण देखने की प्रतियोगिता तू ही जीतेगा .बेटे ने वैसा ही किया .उसे ईनाम और राज दरबार में मंत्री का पद मिला .सभी गाँव वाले उसकी बुद्धिमत्ता से चकित रह गए.राजा ने भी पूछा .उसने अभय दान मांगते हुए सच्चाई बतादी .राजा खुश हुआ .उस दिन से उसने इस प्रथा का अंत कर दिया .उसने प्रजा से कहा --`` अब से किसी भी वृद्ध को अकेले नहीं छोड़ा जाएगा .वे शारीरिक रूप से कमज़ोर हो सकते हैं परन्तु जीवन के अनुभवों से हर समस्या का समाधान कर सकते हैं और भावी पीढ़ी के लिए बोझ नहीं वरदान सिद्ध हो सकते हैं ।`` अतः उनको हमेशा सम्मान मिलना चाहिए ...
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